मैं इंतज़ार करूँगा

दुल्हन का गृह प्रवेश, 
मेहमानों की विदाई,
प्रवास का निमित्त हुआ पूरा 
होनी है मेरी अब घर से जुदाई।

घर को हसरत भरी नज़र से देखा
विरासत में मिली इमारत को देखा,
कृतज्ञ हूँ ब्रह्मलीन अम्मा बाबू की
वजह दी है जड़ों से जुड़े रहने की।

खेत खलिहान ये हवेली
सब कुछ तो छोड़ गए,
बागडोर का एक सिरा
मेरे जिम्मे भी कर गए।

गाड़ी का हॉर्न बजा बाहर
थोड़ा सा कुछ टूटा मेरे अंदर,
बड़ों के चरण स्पर्श कर
छोटों को गले लगाया।

पर्स कंधे पर लटकाकर
भारी मन से कदम बढ़ाया,
औपचारिकता निभाने
कोई कोई साथ बाहर आया।

कदम निकाला दहलीज़ से
पलटकर एक नज़र घर को देखा
अकस्मात रुँधी पुकार आई
आती रहना,इंतज़ार करूँगा।

तुम सबसे ही मेरी रौनक है
तुम्हारे बिना मेरा कौन है।
मालिक ने पाई पाई जोड़
अरमानों से मुझे बनाया था।

बच्चों के सिर पर छत हो
आँखों में सपना सजाया था।
सबसे सुंदर भव्य बने घर
कलकत्ते से राजगीर आया था।

मेरी गोदी में खेलकूद बड़े हुए
चंचल बच्चे,आज बूढ़े हो चले,
जरा सोचो! मैं कितना बूढ़ा हूँ
पता नहीं कब तक खड़ा हूँ।

धूलधूसरित,तालों में जकड़ा
महीनों अँधेरे में डूबा रहता ,
आँधी तूफान सहता हूँ
खानाबदोश मैं रहता हूँ।

सुन रही हो न!मेरी कराह
अपलक तकता हूँ राह,
अकेली नहीं हो तुम,
मैं हूँ ना, तुम्हारे साथ।

निष्ठुर न होना,..जरूर आना,
मेरे घावों पर मरहम लगाना
आओगी तभी तो जख्म देखोगी,
निर्जन बूढ़ी आँखे बेचैन देखोगी।

तुम्हारे आँसुओं का गवाह हूँ
बिछुड़ने का दर्द जानता हूँ,
तुम्हारी सलामती की दुआ करूँगा,
आती रहना,मैं इंतज़ार करूँगा।।

-------Poonam Tripathi
        06/03/2024

Comments

Popular posts from this blog

इंसानियत (कविता)

तिलिस्मी दुनिया

मेरा मन कागज़ की नाव..