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Showing posts from July, 2021

हम सोचते बहुत हैं

हम सोचते बहुत हैं लेकिन करते कुछ नहीं।। क्योंकि हम डरते हैं अगर साथ सच्चे का दिया तो लोग अकेला कर देंगे साथ मेरा वो छोड़ देंगे।। हम सोचते बहुत हैं लेकिन करते कुछ नहीं।। हम देखते हैं अन्याय होते हुए लेकिन चुप रहते हैं, क्योंकि मन से हम कायर हैं स्वार्थ अपना देखते हैं।। हम सोचते बहुत हैं लेकिन करते कुछ नहीं।। दिल दिमाग पर पड़ी धूल साफ करते नही आलोचना अच्छी कर लेते हैं आवाज़ अंतरात्मा की सुनते नहीं।। हम सोचते बहुत हैं लेकिन करते कुछ नहीं।। हो सके तो सहारा बनो एक बार सुकून दिल को मिलेगा सौ बार दर्द बाँटने से तुमको सुख मिलेगा काम यह इतना भी मुश्किल नही।। हम सोचते बहुत हैं लेकिन करते कुछ नहीं।। --------पूनम त्रिपाठी         23/07/2021     🙌💐🙏🙏💐🙌

नारी हूँ मैं

नारी हूँ मैं, न्यारी हूँ मैं माँ, बेटी,बहन,पत्नी हूँ मैं इन रिश्तों से बंधी हुई हूँ मैं लेकिन खुश हूँ इन रिश्तों में महफूज़ हूँ, अपनों के संग में घर के बाहर की दुनिया अलग है हर देखने वाले का चश्मा अलग है हुस्न की मलिका,बहारों की रानी ऐसी नज़र से देखी मेरी जवानी आईना मेरे पास भी है देखती हूँ मैं क्या हूँ, कैसी हूँ भ्रम में नहीं हूँ अस्तित्व अपना पहचानती हूँ मुझको, मुझमे ही रहने दो अंतर्मन व्यथित बहुत है नारी हूँ मैं, मुझको जीने दो।। ~~~~~ Poonam Tripathi

मेरी नई पहचान (एसिड अटैक)

मेरी नई पहचान, पहले से ज्यादा बोलती है वो छटपटाहट,दर्द,चीख मेरे कानों में गूँजती है याद आता है हादसे के बाद जब आईना देखा जालिम की करतूत बयाँ करते चेहरे को देखा बहुत बेबस थी ,कुछ हाथ बढ़े मुझको सहारा देने  डॉक्टर देव जुट गए मुझको नई जिंदगी देने अपने अंदर सोई नारी को होश में लाया मैंने हुनर तराशा, कर्मों, हौसलों को हवा दी मैंने न सहना पड़े किसी को दर्द, संघर्ष की ठानी है ये हादसा तेरे विकृत मस्तिष्क की निशानी है तेरे मेरे किस्से की, बिन कहे सुनानी कहानी है कोई देखते ही मुँह फेर लेता, कोई मुस्करा देता है कोई अचरज से मुड़ मुड़ देखता कोई तंज कसता है परवाह नही बेदर्द दुनिया की, न आँसू बहाऊँगी दरकार नही बेचारगी की,न दर्द दिल का दिखाऊँगी सजती संवारती हूँ, ईश्वर की एक महान कृति, नारी हूँ मेरी नई पहचान के साथ जिंदगी जोश से जीती हूँ।। ~~~~~~ Poonam Tripathi

चाय संग आगाज़ दिन का

दिन की शुरूआत बहुत ही खास होती है दिल में अहसास तेरा हाथ मे चाय होती है हर चुस्की संग तेरी यादें तैरती हैं आँखों में आँखों की कोरो से चुपके से टपक जाती हैं उड़ती भाप संग उड़ जाती हसरतें मन की चाय के साथ ही समेटती लड़ियाँ यादों की वादा निभाना है मुझको सदा मुस्कराने का निकलती हूँ लिखने किस्सा नए दिन का।। ------पूनम त्रिपाठी

छूटते रिश्ते और सफलता(कविता)

चोटी पर पहुँच कर देखा दूर दूर तक फैला आसमान  खूबसूरत सी वादियाँ बादलों की सैर का नज़ारा पुकारा ,आओ देखो  कितना सुंदर है नज़ारा सुनने वाला कोई न था सन्नाटा पसरा, मैं अकेला मैंने भी मुड़कर कहाँ देखा  साथी सारे पीछे छूट गए  चोटी पर जगह की कमी है मेरे दिल मे प्यार की नमी है नही छोड़ना अपनों का साथ छोटी सी जिंदगी मिली है,  हर लम्हा खुशी से जीना है मुझे ज़मी पर ही रहना है।। ----पूनम त्रिपाठी

मेरी भोर की अभिलाषा

खुशनुमा सुबह आयी उम्मीदों की रोशनी लायी नया दिन, नई उमंगे, नई तरंगे साथ लायी अधूरे सपनों पूरे हों,मन में दृढ़ विश्वास लायी नतमस्तक हूँ श्रद्धा भाव से प्रभु तुम सुन लेना आस न टूटे किसी की, न टूटे दिल किसी का भलाई का संचार हो, मन में किसी के न द्वेष हो सदभाव, शांति, प्रेम, मानवता का परिवेश हो सुबह की प्रार्थना मेरी,कृपा प्रभु की सभी पर हो। -----पूनम त्रिपाठी

अकेलापन

अकेलापन एक अहसास होता है अकेलापन तो सिर्फ कहने का होता है अंतर्मन में तभी सर्वाधिक शोर होता है व्याकुल मन, किंकर्तव्यविमूढ़ होता है, अकेलेपन से कभी दो चार हो जाओ इस अंतर्मन के तूफ़ान से बाहर आओ, मुस्कराओ,नज़र घुमाओ चारो ओर प्रकृति को देखो,नदी झरने आदि देखो ये भी तो अकेले है, पर कितने अनोखे हैं खुशियाँ देते, प्रफुल्लित मन कर देते हैं तुम ही पहल करो,निकलो हाथ बढ़ाओ जा बैठो किसी के पास,दिल बहलेगा अकेले तुम ही नहीं इस दुनिया में भीड़ में भी अकेले बहुत हैं किसी ने कह दिया, किसी ने मन मे रख लिया अकेलेपन से समझौता कर लिया।। ----पूनम त्रिपाठी

एक आधार नंबर यह भी

आजकल कोरोना महामारी ने हम सबको घरों कि चारदीवारी में सीमित कर दिया है।इस समय एक मौका भी है कि हम अपने संबंधों को मजबूत करें, जिनसे समयाभाव या अन्य कारणो से दूर हो गए है उन संबंधों को पुनर्जीवित करें। आज पुराने खयालों में विचरण करते उन दिनों  की याद आयी जब आजीविका के लिए अपने घर यानि कि इलाहाबाद शहर से दूर पंतनगर आना हुआ। एक स्मृति साझा करती हूं🙏 *एक आधार नंबर यह भी*--------😊 इलाहाबादियों की एक पहचान है....   *UP70*....😊🎊।।।। इस नंबर ने भी बहुत से इलाहाबादियों को परदेस में एक दूसरे से मिलाने  में अपनी भूमिका निभाई है। --------------- बात उन दिनों की है जब मेरे पति की पंतनगर विश्विद्यालय में सहायक प्राध्यापक के पद पर नियुक्ति हुई थी।हम बिल्डिंग की दूसरी मंजिल पर रहते थे।जब भी उनके घर आने का समय होता मैं बालकनी में खड़ी उनकी राह देखती थी, अमूमन रोज़ का यही सिलसिला था। एक दिन हमने देखा कि उनकी स्कूटर घर की बिल्डिंग में मुड़ी नही आगे बढ़ गयी।दरअसल जो स्कूटर कुछ फासले पर उनके आगे जा रही थी उसमें जो *UP70* का इलाहाबादी चुम्बक लगा था वो अपनी ओर खींचता ले जा रहा था। दो बिल्डि...

जीवन संघर्ष

जीवन की इस यात्रा में लोग हज़ारों मिलते है, लेकिन उनमें से किंचित,   इंसान असल में होते है। निश्छल जानी थी छवि जिनकी, सुख दुख की साथी थी जिनकी, सबके सब नाता तोड़ चले, बढ़ गए अकेला छोड़ मुझे। न्यारा है खेल विधाता का, हम सबके भाग्यविधाता का, जीवन की यात्रा जारी है, नित मिलती नई सवारी है। कोई गुमसुम सा बैठा है, कोई ग़म में डूबा डूबा, कोई छलकाता गागर खुशियों की, कोई दिखता मस्त कलंदर सा। कोई रूखी सूखी से खुश है, कोई ललचाता रबड़ी को। कोई मोटर से बाजार चला, कोई पैदल ही बंगाल चला। कोई सूनी गोदी भरने को, मंदिर मज़ार पर भटक रहा,  कोई बूढ़ी पथराई आंखों से, बेटे की राह निहार रहा। कोई आशा के दीप जला, सूरज की बाट जोहता है। कोई भाग्य भरोसा करके, सड़क किनारे बैठा है। छाए चाहे गम के बादल, या आए झोंक बहारों के, स्वागत दोनों का करना है, आलिंगन इस जीवन में, सुख दुःख दोनों का करना है। ------ पूनम त्रिपाठी        29/05/2020

अंतर्द्वंद

दो वर्ष पूर्व का वाक्या है,फाइनल परीक्षा चल रही थी, इलेक्ट्रॉनिक्स अंतिम वर्ष के कुछ स्टूडेंट्स आये ऑफिस में "नो ड्यूस" कराने, कुछ अपने बनाये मॉडल दिखाने।उनसे भविष्य के बारे में बातचीत हुई।कोई UPSC तो कोई CAT तो कोई GATE आदि परीक्षाओं में प्रतिभाग कर रहे थे।हमने आदतन "all the best" कहा सबको, स्टूडेंट्स भी thanks की औपचारिकता निभाते चले गए। हमको इलाहाबाद के वो दिन याद आये जब हमारे घर बहुत से रिश्तेदार और गाँव से लोग आते थे, प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रतिभाग करने। तड़के ही माँ जग जाती और हलुआ पूड़ी बनाती सबके लिए । एग्जाम में कोई खाली पेट न जाये और समय से परीक्षा केंद्र पर पहुँचे। पूरे उत्साह से सबको आशीर्वाद देती और गेट तक छोड़ने भी जाती थीं।पिताजी भी अपने अनुभव से सबका  मार्गदर्शन करते, विभिन्न उदाहरण देते हुए मनोबल बढ़ाते। हम बहन भाइयों और उन सब रिश्तेदार और अन्य लोगो मे कोई भेद नही करते, सबको ईमानदार सलाह देते।उनकी सफलता से खुश भी होते। उस दिन स्टूडेंट्स के जाने के बाद मन मे अंतर्द्वंद्व छिड़ गया। तत्काल कुछ पंक्तियों की रचना की और फेसबुक पर पोस्ट कर दिया।आज उन चंद पंक्...

27 सितंबर 2020 बालिका दिवस पर विशेष

आज बेटी दिवस है,आप सभी को बेटी दिवस की बधाइयाँ। दो बेटियों की माँ हूँ इसलिए बधाइयाँ और शुभकामना संदेश प्राप्त हुए।कुछ मित्रों द्वारा उनके यहाँ बेटी न होने का अफसोस भी जताया गया। मुझे याद आया वो दिन जब हमारे घर में बेटी का जन्म होने और स्वयं के घर पुत्र जन्म पर कितनी विरोधाभासी प्रतिक्रिया थी इन लोगो की। खैर इस बारे में बाद में लिखूँगी कभी। आज एक कविता साझा कर रही हूँ बहुत पहले जब भी दिल्ली जाती उस लड़की को कई बार देखा था तब लिखी थी। उस बेटी के लिए जो गरीबी में पल रही है, वक़्त से पहले घर की कमाई में योगदान दे रही है और अपने छोटे भाई बहन के लिए माँ की भूमिका भी निभा रही है। जो लोग अपने घर में बेटी न होने का अफसोस कर रहे है और वास्तव में कुछ समाज के लिए करना चाहते हैं तो इन बेटियों की मदद करें, गोद भी ले सकते है।किसी का जीवन संवर जाएगा और उनकी बेटी की तमन्ना पूरी हो जाएगी।यदि किसी की भावनाएं मेरी बात से आहत हो तो मैं उसके लिए क्षमा चाहती हूँ। 🌹🌹💐💐🙏🙏 नन्ही मुन्नी मासूम सी बिखरे बाल घघरी पहने लिए हाथ में गुब्बारे लाल हरे नीले पीले,  आँखों में उम्मीद लिए गोदी में छोटा भाई लिए, सहमी ...

(कविता) दु:ख

दुःख---- एक दिन चुपके से वो आया आते ही फैलाया साया हतप्रद मैं उसको देख रही मन ही मन उसको कोस रही आते ही उसने दिखलाया जीवन ऐसा भी होता है संगी साथी सबके होते कितना वीराना होता है जाऊ चाहे जिस महफ़िल में मन मरघट मालूम होता है एक दिन उसने झकझोरा मुझे,  "उठ!कैसा हाल बनाया है" खुद को तुमने पहचाना नहीं क्या कुछ न छुपा है तुममे कहीं, बेमन ही सही मैं चलने लगी हर मुश्किल को हल करने लगी हर हाल में अब मैं जीने लगी छोटी सी खुशी भी अब मुझको जन्नत सा सुख देने लगी अब वह ही सच्चा हमदर्द है और कहने के लिए वो "दुख" है।।  ~~Poonam Tripathi    03/07/2020

इंसानियत (कविता)

इंसानियत----- शाम ए गम रोज़ आती है गुजर जाने के लिए, शुक्र ए आफताब रौशन जहान करता है। दस्तक देती है जिंदगी स्कूलों, बाज़ारों और गलियों में, दर्ज़ करती है नए किस्से सबके अपनी किताबों में। उठते गिरते संभलते  गुजर ही जाएगी, पन्ना पन्ना किताबे जिंदगी एक दिन भर जाएगी। छद्म लिबास से निकलो, बाहर आओ!! मैं लिखती हूँ, तुम भी विरासत में इंसानियत लिख जाओ।। ~~ पूनम त्रिपाठी     17/06/2020

जीवनमंत्र(कविता)

जीवन है एक बहती नदी साहिल से टकराती रहती निज जीवन में हमको भी, लहराते टकराते रहना है। सुख दुख दोनों हालातों में सामंजस्य बनाये रखना है, तूफानों से लड़ते भिड़ते जीवन भवसागर तरना है। जिंदगी अनदेखी अनजानी है हर मुश्किल हल हो जानी है, हर तमन्ना पूरी हो जरूरी नहीं मन मुताबिक मिले जरूरी नहीं। काश,अगर, मगर लगा ही रहेगा कुछ न कुछ मिलता, छूटता रहेगा, वक़्त आएगा, मुस्कराते चलते रहिये छोटी सी भी खुशी को सहेजते रहिये। हौसलों की उड़ान कम करना नही, जिंदगी को हल्के में कभी लेना नही। हिम्मत में ताकत होती है बहुत मंजिल से पहले कहीं रुकना नही। कामयाबी के अवसर मिलेंगे बहुत नज़र रखना तुम, उनको गँवाना नहीं। हमने देखा है उम्मीदों को तरसते हुए और नन्हे जुगनुओं को चमकते हुए।। - --- पूनम त्रिपाठी        पंतनगर

मेरा हौसला

कभी-कभी जिंदगी की जद्दोजहद में हताशा निराशा इस कदर हावी हो जाती है कि एक पल को सब कुछ खत्म सा महसूस होने लगता है।दिमाग भी सुन्न पड़ जाता है, सोचने समझने की शक्ति शून्य हो जाती है। तभी अचानक एक अदृश्य शक्ति आपको हौसला देने आती है।वह शक्ति ईश्वर में आस्था और विश्वास    के कारण मिलती है।वह शक्ति है हमारा आत्मबल,आत्मविश्वास जो कहता है कि "नहीं! अब और नही,जीवन एक युद्ध है,जब तक जीवन है युद्ध करना है।"  कुछ वर्ष पूर्व एक दिन #समाचारपत्र में एक महिला की कहानी पढ़ रही थी। उस कहानी की महिला को विषय बनाकर कुछ पंक्तियाँ लिखी थी।✍️✍️👍👍 ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ समंदर की लहरों से रोज़ दो चार होती हूँ पौ फूटते ही फिर कश्ती लेकर निकलती हूँ | तूफानों की कोशिश है मेरी कश्ती डुबोने की, बदलता रहता है अपनी दिशाएं हमला करने की | लहरों के थपेड़े से कश्ती नित होती है जर्जर, उड़ान मेरे हौसले की इन लहरों पर नही निर्भर | समंदर में उतरने को नित नई कश्ती बनाती हूँ, नवजीवन गीत गाने को लहरों से मिलने जाती हूँ | जीवन युद्ध जारी है परीक्षा अनवरत हमारी है, नया इतिहास लिखने की अब बारी हमारी है || ------ पूनम त्रिप...

कन्यापूजन

अक्टूबर माह आरम्भ हो गया।नवरात्रि,दशहरा,दीपावली आदि पर्वों का पूर्व की भाँति ही आगमन होगा और हम सब उत्साह से पर्वों के स्वागतातुर तैयारियों में जुट जायेंगे। दशहरा से याद आया कि बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व है।  हाल में घटित घटनाओं ने व्यथित किया और सोचने पर मजबूर किया कि बुराई साल दर साल, हर युग मे जन्म ले रही है। गली-गली,शहर-शहर, रावण, दुर्योधन, दुसासन, रक्तबीज की भाँति जन्म ले रहे लेकिन राम और कृष्ण अवतरित नही हो रहे।इन त्योहारों को मना कर क्या हासिल हो रहा है, ऐसे इंसान के रूप में शैतान हैवान अलमस्त घूम रहे है। कोई बचाने वाला नही था उस बच्ची को?? "कहाँ हो राम?कहाँ हो कृष्ण?क्या कलयुग में तुम भी असहाय हो गए हो।😞😞🤔🤔

बुजुर्ग की व्यथा

आजकल एकल परिवार का चलन बढ़ गया है।हम उस पीढ़ी से वास्ता रखते हैं जब संयुक्त परिवार हुआ करते थे। बुजुर्गों का परिवार में विशेष महत्व था,उनके मार्गदर्शन में ही परिवार के कामकाज़ और महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते थे।समय बदला, शिक्षा का प्रचार प्रसार हुआ और शिक्षित सदस्य का परिवार में महत्व बढ़ने लगा।जाने अनजाने बुजुर्ग नज़रअंदाज़ होने लगे और उनकी अहमियत भी कम होती चली गयी।किसी भी मुद्दे पर यदि अपनी राय सलाह देना भी चाहे तो अनुभवी बुजुर्गों को अक्सर चुप करा दिया जाता है यह कहकर कि ......"ज़माना बदल गया है,आप नही समझेंगे या आप सठिया गए है"। "एक चुप हज़ार चुप" की सीख देने वाले रिसते आँसुओं को रोक होंठ सी लेते हैं।वही बहुत से बुजुर्ग घुटने के दर्द,अल्ज़ाइमर आदि बीमारियों से ग्रसित रहने के कारण असहाय पड़े रहने को विवश हैं। कहा गया है कि बच्चे बूढ़े एक समान,दोनों को ही देखभाल की आवश्यकता होती है।बच्चों को तो माँ-बाप संभाल लेते हैं लेकिन बुजुर्ग मनमसोस कर अपनी अवस्था को कोसते पड़े रहते हैं।जिसका परिणाम यह होता है कि समय के साथ वो बच्चों की तरह जिद्दी बन जाते हैं।ज्यादातर की व्यथा यही है, बहु...