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Showing posts from May, 2022

फ़िज़ाओं की बात

बात फ़िज़ाओं की क्या करूँ रौनक खुद ही बयां करती है पहलू में जा बैठो कभी इनके हर दर्द की दवा यहाँ मिलती है आग बरसाता है सूरज ज्यों ज्यों अमलतास के झूमर सज़ा लेती है किसी मौसम से हार कहाँ मानती है भयंकर तूफानों से भी लड़ लेती है मूक संदेशे, इशारे समझो इनके अपनी उम्मीदों के संभालो मनके वक़्त करवट बदलेगा जिस दिन मुस्कराकर खिल उठोगे उस दिन बंद पलकों से महसूस करो  खुशबू बहारों की सुकूँ देती है   सहेजो,प्यार फ़िज़ाओं से करो ज़मी पर जन्नत सा सुख देती है।। ~~~Poonam Tripathi          12/05/2022

अमलतास गुलमोहर

अमलतास गुलमोहर की मनमोहनी छटा निराली है ऊष्णता में इनकी निर्मलता जित देखो, तित छाई है, अमलतास ने सड़कों पर सुंदर कंदीलें लटकाई हैं, प्रात सैर को निकलो देखो बसंती चादर बिछी हुई, गुलमोहर के अंगारों से  इत उत धरती पटी हुई, गुलमोहर बाहें फैलाये स्वागत को आतुर देखो, इनकी छाया में बैठे सुस्ताते राहगीर देखो, गर्मी ज्यों ज्यों हुई प्रचंड त्यों त्यों ये मुस्काते है, तोड़ गर्मी का घमंड ये झूमते लहराते है, सानिध्य में रहकर इनके नैसर्गिक सुख हम पाते है। ~~~~Poonam Tripathi            26/05/2022            Pantnagar

गर्मी के शहंशाह

हे! दिनकर,आदित्य, दिवाकर गर्मी के शहंशाह हो तुम आग उगल रहे धरती पर कुछ तो रहम दिखाओ तुम। पशु-पक्षी व्याकुल गर्मी से नाजुक पौधे झुलसे जाते हैं कूलर पंखे सब फेल हो गए नलके पोखर सूखे जाते हैं। उड़ा ले गए पानी को तुम खेती बाड़ी बियाबान है, धरती का फटता जाता सीना  खेतिहर सब परेशान हैं। मजबूरी है मजदूरी की मेहनतकश हलकान हैं। पेट की गरमी भारी उनकी मेहनत करते जी-जान हैं। खत्म करो तुम पारी अपनी  जल्दी से भेजो बरखा रानी झम झमाझम बरसे पानी मिट जाए धरती की वीरानी। बेल आम जामुन तरबूज खीरा ककड़ी और खरबूज तुम न आते तो क्या होता स्वाद हमें इनका न मिलता। हरियाली का महत्व बताया गरमी के तीक्ष्ण प्रकोप से हे! दिनकर आदित्य दिवाकर आभार तुम्हारा है दिल से। ~~~~Poonam Tripathi            27/05/2022            Pantnagar

वक़्त ठहरता नहीं

वक़्त कब कहाँ ठहरता है रंग रूप बदलता रहता है राग विराग दे जीवन में यह हमें परखता रहता है। बसी बसाई बस्ती को तूफान उजाड़ा करता है, उपवन की हरियाली को पतझड़ बेरौनक करता है। विपरीत समय के आने पर दिग्गज भी टूट ही जाते है जैसे ग्रहण की छाया में सूरज चंदा घिर जाते है। फिर बात वहीं पर आती है ज़मीं नहीं किसी की थाती है चक्र विनाश-विकास का सृष्टि सुनिश्चित करती है। वक़्त के कुठाराघात से कोई बच नही सकता है, स्वीकार मनुज ज्यों करता है अवचेतन मन जी उठता है। धीरे धीरे समेटने लगता है खुशियों के बिखरे अवशेष, सम्बल से जिनके कट जाते उनके जीवन के पल अशेष टूटे-काटे वृक्षों में भी तुमने कोपलें खिलते देखी होंगी वक़्त बुरा हो या अच्छा हो प्रभु पर निष्ठा रखनी होगी। वक़्त बदलता है उसका ही भगीरथ प्रयास जो करता है हौसले और पुरुषार्थ की नित नई इबारत लिखता है।। ~~~Poonam Tripathi         24/05/2022         Pantnagar

वो भयावह दिन

भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का त्यौहार रक्षाबंधन के आते ही बहुत सी स्मृतियाँ     मन मस्तिष्क के गलियारे से गुजरने लगती है। उम्र बढ़ने के साथ बचपन कहीं खोता छूटता जाता है और हम अपने अपने परिवार और उनके प्रति अपने दायित्वों के निर्वहन में व्यस्त हो जाते हैं।रिश्तों का स्वरूप भी परिवर्तित होकर अपनी उस मिठास को कायम नही रख पाता।यादों के वातायन से बहुत से किस्से हमारे समक्ष जीवंत हो जाते है। ये उन दिनों की बात है हम बहुत छोटे थे और जब बड़े भाई की समझदारी से जान बची। मेरे पापा उत्तर प्रदेश सरकार के गन्ना विभाग में अधिकारी थे। किसानों और गन्ना समितियों से संबंधित कार्य के लिए उनको अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों का दौरा करना पड़ता था। जब कभी पेराई-सत्र के दौरान किसी कारणवश चीनी मिल में गन्ना उपलब्ध नही होता था, तब आपात स्थिति में सरकारी गन्ना खरीद केंद्रों पर रात में भी जाना होता था।  हमारा परिवार छोटे से कार्यालय परिसर में बने सरकारी आवास में रहता था।मेरे दो भाई और मैं स्वयं, तीनों छोटे बच्चे थे।मेरी उम्र लगभग 4 साल,बड़े भाई की 7 साल और छोटे भाई की 2 साल की रही होगी। एक बार किसानों की गन...

मौसम बदलता है

मौसम जो बीत गया उसका अफ़सोस क्या करो वर्तमान को जीते चलो। मौसम तो आते जाते हैं गुजरे पल वो जीवन के वापस कभी न आते हैं, इसलिए जियो हर पल उल्लास से,जी भर मौसम की आवृत्ति पर फिर जी लेना,जी भर।। सब कुछ वैसा ही निखरेगा सूरज-चंदा चमकेगा चिड़ियों का गुंजन होगा फूलों से धरा सजेगी बरखा शीतल बरसेगी, संग संग बीतेगा हमारा जीवन का इक बसंत, चाँदनी बालों की खिलेगी विस्तारित अनुभव बेल होगी झुर्रियों के आवरण से चेहरे की गरिमा बढ़ेगी। हर दिन एक सा न होगा कोई अनचाहा मिलेगा चाहने वाला छूटेगा, काश,अगर और मगर अक्सर लगा ही रहेगा इसलिए जी लो जी भर देख लो सब नयन भर प्यार बाँटो, प्यार पाओ जो बुरा हो, भूल जाओ छूट जायेगा यहीं सब कोई जानता नहीं,कब! इसलिए कहती हूँ प्यारे, वक़्त अच्छा या बुरा था आखिर बीत ही गया वो अफसोस उसका क्या करो हर दिन हर पल जीवन का खुशनुमा मौसम करो।। ~~~Poonam Tripathi        12/04/2022         Pantnagar

साथी हाथ बढ़ाना

खाली हाथ हम आये हैं खाली हाथ ही जाना है, धन-दौलत, रिश्ते-नाते कुछ भी साथ न जाना है। जीवन अपना न व्यर्थ करो सद्कर्म सदा निःस्वार्थ करो बाँटो मुस्कान और खुशियाँ सबकी खिले जीवन बगिया। छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब बनाते एक दूजे का रकीब दिल में हो प्रेमभाव सजीव अपने बन रहते सब करीब। 'मै' की अंधी प्रतिस्पर्धा में आखिर सब हार ही जायेंगे, हरे बाँस की डोली चढ़कर अंतिम पड़ाव तक जाएंगे। हे मनुज! हाथ बढ़ाओ अपना दीन-दुखी भी देख सके सपना गम और खुशी अपनाना सीखें इंसान बनें,जीवन जीना सीखें। Poonam Tripathi 18/09/2021

मैं मज़दूर हूँ

मैं मज़दूर हूँ बनाता हूँ इमारतें शानदार मंदिर,मस्ज़िद गुरुद्वारे आलीशान कोठियाँ, मगर मेरे नसीब में हैं टूटी झोपड़ी,सुखी रोटियाँ मैं मज़दूर हूँ ख्वाहिशें नही पालता  मेहनत से दो जून  रोटी जुगाड़ करता हूँ शाम को परिवार संग  प्रेम रस में डुबा खाता हूँ मैं मज़दूर हूँ तपती धूप,बारिश हो या हाड़ कंपाता जाड़ा कमर तोड़ मेहनत कर परिवार अपना पालता  संतोष है,भीख नही मांगता। मैं मज़दूर हूँ संगी साथी मुझ जैसे हैं खटते दिन-रात खेतों में खदानों,कारखानों,बाजारों में दम तोड़ती है हिम्मत यदा कदा आगे बढ़ा हाथ सहारा देते सदा। मैं मज़दूर हूँ दुःख मनाने का अधिकार नहीं है काल के गाल कोई अपना समाता है श्मशान तक बमुश्किल गम मनाता हूँ सिर पर कपड़ा बाँध कमाने जाता हूँ स्वेद कणों के बहाने आँसू छुपाता हूँ। ----Poonam Tripathi      01/05/2022