इक्के की सवारी..…एक याद
हमारे पापा उत्तर प्रदेश की राजकीय सेवा में थे इसलिए हमारे गृहनगर इलाहाबाद से बाहर ही नियुक्ति रहती थी। पापा साल में दो बार जरूर गांव आते थे एक तो जब रामलीला होती वो गांव की रामलीला में लक्ष्मण का किरदार निभाने छुट्टी लेकर आते थे, परशुराम लक्ष्मण संवाद का मंचन होता था। दूसरा तब जब गर्मी की छुट्टियां होती थी। हम बच्चों को गांव में रहने और वहां से हमारा जुड़ाव बना रहे क्योंकि बहुत बड़े परिवार में अन्य सदस्य वहीं रहते थे इसलिए हर साल गांव जाते थे। हमारे बचपन में गांव तक पक्की सड़क नहीं बनी थी। *इक्का* ही चलता था। तब कोई संचार के साधन नहीं थे जैसे आज है।चिठ्ठी से ख़बर पहुंचती थी ।निश्चित दिन हमारे बड़े भैया ( ताऊजी के बेटे) गांव परिवार के कुछ लोगों को साथ लेकर सैदाबाद स्टेशन आते इक्का रिजर्व साथ में । हम अपने दो भाईयो के साथ *इक्के* की सवारी करते गांव पहुंचते, कच्ची सड़क पर पूरा हिलते डुलते हुए। गांव के बाहर ही छोटे बच्चे जो हमउम्र थे हमारे वो इंतज़ार करते रहते थे।जैसेही कोई *इक्का* दिखता चिल्लाना शुरू.... ......आई गए, आई गए चाचा आई गए.... ........कुछ बच्चे इक्के पर सवार हो जाते,...