परम्परा.. एक स्मृति

सर्व विदित है कि नवरात्र जगतजननी माँ दुर्गा की पूजा,व्रतके साथ पूरी श्रद्धा एवं भक्ति भाव से मनाया जाता है।इलाहाबाद में प्रत्येक दिन किसी न किसी मोहल्ले की चौकी निकलती है, नवरात्र की समाप्ति के अगले दिन दशहरा का पर्व भी उत्साह पूर्वक मनाते है।
इलाहाबाद में एक विशिष्टता यह भी थी कि घरों में रामचरित मानस का पाठ भी होता था।कहीं से भी गुजरो हर रास्ते में किसी न किसी घर में या छत पर जाते ही हर दिशा से रामचरित मानस पाठ के स्वर सुनाई देते थे। 28 साल से अपना शहर छूट गया, अब याद जरूर आती है।हमारे घर मे भी हर साल रामायण पाठ होता अगले दिन पूर्णाहुति हवन होता,इस दौरान बड़ी अम्मा,मम्मी,बुआ,मामी,मौसी,बड़ी भाभियाँ,दीदी और मोहल्ले की सब महिलाएं पारंपरिक लोक भक्तिगीत गाती,पूरा भक्तिमय वातावरण से घर एक मंदिर जैसा होता था। तत्पश्चात प्रसाद वितरण के साथ ही रात्रिभोज भी होता था।हम रात में जागते थे और रामायण पढ़ने वाले लोगों के लिए अदरक,कालीमिर्च,तुलसी वाली चाय बनाते थे।उस समय रामायण पढ़ने के लिए मंडली नही बुलाई जाती थी। संयुक्त परिवार था,घर परिवार और गाँव से लोग आते थे और पूरे उत्साह से ढोलक हारमोनियम मजीरा बजाकर आनंद लेते हुए पाठ होता था।
एक साल पापा को ब्रेन हैमब्रेज हो गया,पापा नही रहे घर की यह परंपरा भी रुक गयी।समय परिवर्तन के साथ ही देखा कि लोगों के यहां मंडली बुलाकर यह आयोजन होने लगा है। धीरे धीरे टेलीविजन का असर दिखने लगा,रामायण पाठ की जगह देवी जागरण ने ले ली। 
परिवर्तन जीवन का नियम है। आजीविका के लिए हम जैसे बहुत लोग इलाहाबाद से दूर हो गए है।एकल परिवार,महंगाई, नौकरी में वक़्त और लोगों में परस्पर प्रेम भाव की कमी आदि कारण हैं जिनकी वजह से परम्परागत आयोजन नही हो पा रहे है।रामचरितमानस का पाठ विशेष अवसरों पर ही आयोजित हो रहा है, लोग देवी जागरण में फिल्मी धुनों पर थिरकना ज्यादा पसंद कर रहे है। अब जिस भागमभाग में लोग जी रहे है, देखना है यह परम्परा कब तक कायम रहेगी।

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