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बचपन का जाड़ा

बहुत कँपावई,जाड़ा सबका ओढ़ि रजाई रहई सब दुबका मावा जब जब कउड़ा बारै निकरि घरे से चलई दुआरे गोल बनाय के तापईं सब केउ धुँआ की ओरिया न बैठई केउ आलू भूजि भूजि के खाय कबहु कबहु लिट्टिउ होई जाय केतनअउ जाड़ा पाला परई अम्मा रोज भोरहरिन उठई चूल्हा बासन, झाड़ू बहारू सानी भूसी खियावई गोरु दिन निकरत तक आगी बारइ रकम रकम क भोग बनावइ सरसों अउर चना क साग मटर क घुघरी लल्लनटॉप ऐसइ जाड़ा बीतत रहा बड़ा मज़ा लड़िकइयाँ म रहा। Poonam Tripathi 09/02/2022