गर्मियों के वो दिन
बहुत याद आते है वो दिन बचपन की गर्मियों के शाम होते ही छत को पानी से भिगोना गद्दों को ज़मीन पर लाइन से बिछाना बड़ो के लिए चारपाई पर बिस्तर लगाना मटके में पानी भर लाना किनारे पर कौन सोएगा होती थी नोकझोंक देर रात तक चलता, किस्से कहानियों का दौर जाने कब सो जाते नींद के आगोश में चाँद-तारों की छाँव में भोर में चिड़ियों का कलरव जगाता था जो न जगता उस पर पानी छिड़का जाता था। गर्मी की रात,अब भी होती है मगर वो बात कहाँ होती है कोई टीवी के सामने बैठा तो कोई मोबाइल में मगन दादी नानी के किस्से अब नहीं होते हैं एक छत के नीचे सब अजनबी से रहते हैं सुबह भी वो अब होती नही नींद दस से पहले टूटती नहीं दिन-रात एक से होते हैं एसी के बंद कमरे में सबके समय कटते है। ~~Poonam Tripathi 26/04/2022