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Showing posts from January, 2022

दिल की चाहत

दिल की चाहत  बस इतनी सी, बचपन में वापस जाऊँ तितलियों के पीछे भागूँ, बरसात में दोस्तों संग भीगते, मस्ती करते स्कूल से घर आऊँ, जी भर झूलूँ झूला पींगे बढ़ा इठलाऊँ। मौज फिसलती गयी उम्र के सोपान चढ़ने में, उलझ के रह गए हैं जिंदगी की जद्दोजहद में, सुबह से शाम होती है अब नून,तेल और लकड़ी में। सब कुछ है बस सुकून नही है अपने है पर अपनापन नहीं है। दिल की चाहत बस इतनी सी,  उड़ती फिरूँ दरख़्त दर दरख़्त, जीवन के जंजाल से मिलती नही फुरसत, ख्वाबों में भी अब वही दुनियादारी, न परियों का देश न उड़ते घोड़े की सवारी, बिन पिंजरे कैद पंछी सी बिन मंजिल की राही हूँ , मन के बच्चे को बहलाते, अनमनी मैं फिरूँ, जाहे विधि राखे राम मन में धीर धरूँ । Poonam Tripathi 16/01/2022 Pantnagar

यही जिंदगी है

हर दिन के ढलते ही सुस्ताती बेचैनियों संग कुछ खट्टा कुछ मीठा  तजुर्बे का खजाना लिए चढ़ती हूँ घर की ड्योढ़ी  दिल-दिमाग से ढीली कर झंझावाती विचारों की पकड़, चाय के घूँट में सुकून तलाशते परे रखती हूँ दिन भर का बोझ, सजाया था जिसको दिन भर स्वावलंब और स्वाभिमान के मिश्रित रंगों की हनक से, परिदृश्य धरातल का हौले हौले बदलता है क्योंकि लबादा बदलना है ख्वाबों की फेहरिस्त को कपड़ों की तह में रखते जाना है जिंदगी के गुणा भाग से दूर किताबों में सर खपाते बच्चे तैयार कर रहे है स्वयं को समझते है माँ के मर्म को चंचल निगाहें उनकी बोलती  माँ भूख लगी,खाना कब दोगी आश्वासन की ओढ़ मुस्कान  रसोई में प्रवेश करती हूँ वात्सल्य रस उड़ेल उड़ेल भोजन पकाती,खिलाती हूँ तराशती हूँ हुनर अपना समेटती हूँ कामकाज, न शिकायत न कोई सपना न ही जानना राजकाज दोस्ती है किताबों से मेरी उनसे रोज़ मिलना है जरूरी रूबरू कराती है जमाने से नित नए नए किरदारों से इसी मेल मिलाप में एक नई सुबह के इंतज़ार में जाने कब आँख लग जाती है अब ये ही जिंदगी है  और ये ही मुझको प्यारी।। पूनम त्रिपाठी 21/01/2022

हिंदी हूँ मैं

*विश्व हिंदी दिवस २०२२*💐 ---------------------------------------- हिंदी हूँ ,हिंदी हूँ मैं माँ भारती के भाल सुशोभित दमक रही बिंदी हूँ मैं।। उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम चहुँदिश बँटे हुए है लोग, क्षेत्र और भाषा के नाम अपनों से बैर कर रहे लोग, हूँ मैं हिंदी भाषा देश की सबको जोड़े रखती, मातृभाषा का दर्जा  यूँ ही नही मैं रखती। हिंदी हूँ ,हिंदी हूँ मैं माँ भारती के भाल सुशोभित दमक रही बिंदी हूँ मैं।। देश रहो या बनो प्रवासी जुड़ी रहूँगी गर्भनाल सी, विश्वपटल पर हिंदी से ही तुम पहचाने जाओगे, भारत की खुशबू लेने को हिंदी ही अपनाओगे। हिंदी हूँ , हिंदी हूँ मैं माँ भारती के भाल सुशोभित दमक रही बिंदी हूँ मैं।। गोरों की जंजीरे भी मुझको जकड़ नही पायीं, हिंदी गीतों और नारों से आँधी इंकलाब की आयी, धन्य हुई,गौरव भी पाया सुबह आज़ादी की आयी। हिंदी हूँ , हिंदी हूँ मैं माँ भारती के भाल सुशोभित दमक रही बिंदी हूँ मैं।। उठो,जागो का लक्ष्य लिए विवेकानंद बनना होगा, परित्यक्ता सी हूँ स्वदेश में मुझको अपनाना होगा, 'निजभाषा उन्नति अहै..' याद सदा रखना होगा। हिंदी हूँ , हिंदी हूँ मैं माँ भारती के भाल सुशोभित दमक रही...