दिल की चाहत
दिल की चाहत बस इतनी सी, बचपन में वापस जाऊँ तितलियों के पीछे भागूँ, बरसात में दोस्तों संग भीगते, मस्ती करते स्कूल से घर आऊँ, जी भर झूलूँ झूला पींगे बढ़ा इठलाऊँ। मौज फिसलती गयी उम्र के सोपान चढ़ने में, उलझ के रह गए हैं जिंदगी की जद्दोजहद में, सुबह से शाम होती है अब नून,तेल और लकड़ी में। सब कुछ है बस सुकून नही है अपने है पर अपनापन नहीं है। दिल की चाहत बस इतनी सी, उड़ती फिरूँ दरख़्त दर दरख़्त, जीवन के जंजाल से मिलती नही फुरसत, ख्वाबों में भी अब वही दुनियादारी, न परियों का देश न उड़ते घोड़े की सवारी, बिन पिंजरे कैद पंछी सी बिन मंजिल की राही हूँ , मन के बच्चे को बहलाते, अनमनी मैं फिरूँ, जाहे विधि राखे राम मन में धीर धरूँ । Poonam Tripathi 16/01/2022 Pantnagar