मन की व्यथा
मन करता है कहूँ बहुत कुछ पर किससे,कौन सुनेगा मुझको सुन भी लेगा तो भी क्या समझेगा कोई मुझको। नज़रिए है सबके अपने अभाव, तजुर्बे और सोच का साझीदार न कोई यहाँ दर्द का व्यापार हो रहा यहाँ दर्द का। उम्मीद ही क्यों रखना खुद को ही है समझना हालातों से लड़ना हो या खुशियों को सहेजना। मन में गोये रखा है कब से जज़्बातों,वेदना की धार को जुबान तक आये शब्द कई बार मगर खामोशी में ज़ब्त हो गए। आत्मा की आवाज़ को सुन अवलोकित मन को रखा है अपने अंतः में जीवन प्रकाश अक्षुण्ण आलोकित रखा है। जिजीविषा है जीने की प्रभु की मर्यादा रखने की कर लिया है दृढ़ मन को स्वीकारना है जीवन को।। ~~~~Poonam Tripathi 10/08/2022