बहुत याद आएंगे वो अपने जो जुदा हो गए
विगत दिनों मनःस्थिति कुछ अजीब थी।उस दौरान यह आलेख लिखा था विचार थे जो कलम से कागज़ पर उतार दिए। ---------------------------------- मन के अँधेरे कोने में ख़्वाहिशों का डेरा है देखता हूँ फ़क़त इनका कब होता सवेरा है।। कोरोना!!कोरोना!!कोरोना!! यह शोर एक दिन बंद हो जायेगा। याद आएंगे संघर्ष के वो पल जब हमको ऑक्सिजन, अस्पतालों में बेड लेने के लिए गिड़गिड़ाना पड़ा।जीवनरक्षक दवाओं और इंजेक्शन की कालाबाज़ारी का शिकार होना पड़ा।इनसे ज्यादा वो अपने जो सदा के लिए हमसे जुदा हो गए। साथियों उन चेहरों को मत भूलना जिन्होंने 10 ₹ की दवा 10 हज़ार में दी है।मरता क्या न करता!उस समय तो दवा खरीदना मजबूरी थी,क्योंकि अपने अज़ीज़ को बचाना था।ऐसे कठिन समय में जब लोगों को सहारे की जरूरत थी,कुछ धूर्तों ने आपदा को कमाई के अवसर में बदल डाला।ऐसे लोगों का बहिष्कार होना चाहिए। एक महत्वपूर्ण फ़ैसला यह भी करना है कि जो चिकित्सा के व्यवसाय से जुड़े हैं और बेहाल जनता की मदद की है उनसे ही सेवाएं ली जाए। ईमानदार केमिस्ट हैं जिन्होंने वाज़िब दाम में ही दवाइयां दी उनसे ही भविष्य में दवा खरीदें।धूर्तों को सबक सिखाना है।जब उनका धंधा चौपट ह...