सिपाही की कलम से
बीते हुए लम्हे अक्सर आँखों मे तैर जाते है यादों का पूरा लश्कर नश्तर चुभोते जाते हैं मिटे जो देश की खातिर जांबाज़ याद आते हैं। दुश्मन की दगाबाजी वीरों की वो जांबाजी गिरती बिछती हुई लाशें जोश भरी वो ललकारें खदेड़ते जाए दुश्मन को वंदेमातरम के जयकारे। दहल जाता है दिल मेरा जब मंजर याद आता है लहू से लथपथ जवानी का वो जज़्बा याद आता है। गोलियों से छलनी थी छाती लेकिन जयहिंद बोलते गए। लगाकर मौत को गले हँसते हँसते वो सो गए। चाहूँ कि भूल जाऊँ मगर क्या क्या भूलूँ तोपों मिसाइलों की दहाड़ दनादन गोलियां कैसे भूलूँ टूटा जिन पर दुःखों का पहाड़ उनकी चीत्कार कैसे भूलूँ। डूबती धड़कन की पुकार कानों में जब तब गूँजती हैं लाशों से बहती लहू की धार सपने में हरदम दिखती हैं। छुट्टी पर घर गए थे जो सपनें हसीन संजो मन में पुकार आई सीमा से दबा गए अरमान दिल में वादा कर जल्दी आने का वर्दी पहन वो चल पड़े बचाने लाज़ माँ भारती की लाल उसके दौड़ पड़े। बहादुरी की अद्भुत मिशाल शहादत के पहले दिखा दी गोलियाँ दागी,मारा-काटा दुश्मन को धूल चटा दी अंग-भंग,घायल थे मगर अंतिम साँस तक लड़ते रहे रणबाँकुरे साथी मेरे सीमा पर रवानी से मरे। ...