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सर्द दिनों की धूप छाँव

जाड़े का मौसम है।रोज़ सुबह सोकर उठते ही सबसे पहले खिड़की खोलकर बाहर देखती हूँ कोहरा है या नहीं। पाँच बजे सूरज निकला नही होता, धुँध छाई रहती है।स्ट्रीट लाइट की ओर देखकर ठंड का मनोवैज्ञानिक आंकलन करते हुए दिनचर्या आरम्भ हो जाती है। रविवार को छुट्टी थी,रोज़ की तरह खिड़की की हल्की सी झिर्री बनाते हुए बाहर झाँका,वही धुँध लेकिन रोज़ से कुछ ज्यादा गहरी थी।स्ट्रीट लाइट भी दिये की भाँति टिमटिमा रही थी। सुबह की चाय पीते बाहर उजाला दिखने लगा,सूरज निकलने का आभास हो रहा था,रोशनी हो गयी थी परंतु सूरज अब भी कोहरे के आवरण को चीर न सका था।उसका कोहरे को भेदने का निरंतर प्रयास जारी था।  दिनचर्या के क्रम में आगे बढ़ते मेरा सारा घरेलू काम लगभग समाप्त हो गया था। बीच -बीच मे मोबाइल की घंटी बिन बुलाए मेहमान की तरह बज उठती।छुट्टी का दिन होने के कारण कुछ ज्यादा ही फ़ोन आ रहे थे। इनसे उत्पन्न व्यवधान से काम मे विलंब अवश्य हुआ परंतु सुकून भी था कि इसी बहाने एक दूसरे का हाल खबर मिल रहा है।परिवार और मित्रों से संबंध की डोर मजूबत बनी है उसकी सुखद अनुभूति भी हो रही थी इस कारण बरबस ही चेहरे पर मुस्कान आ गयी। बच्चों से साक...