बरस बीते तमाम
बरस बीते तमाम
घर आज फिर आना हुआ,
घर की दहलीज़ पर
एक पल ठिठक से गए कदम
धुँधला सा नज़र आया
अम्मा का लोटे में पानी लेकर आना
हर बार दौड़ी चली आती थीं
मेरे ही अश्कों ने रस्म निभाई
कुछ बूँदें कदमों तक लुढ़क आईं।
सीढ़ियों से चढ़ते,दहलीज़ लाँघ
अंदर चलती चली गई,
एक हाथ से पकड़े पल्लू
दूसरे हाथ में सूटकेस ।
ओसार से गुजरते हुए
हवा की सरसराहट
कानों में कहती महसूस हुई
अम्मा बाबू का आशीष लाई हूँ
आओ संस्कारी बहू हो ना!
जब्त जज़्बातों से रिश्ते निभाओ।
वही घर, वही छत,वही आँगन
पसरा था हर तरफ बेगानापन
सबके पास जाकर मिली
पर अम्मा वाली अहक न मिली।
तसल्ली देती रही खुद को
मुस्कराहट का आवरण ओढ़ लिया,
विवाहोत्सव में सब मग्न
रस्मों के प्रति मेरा अंतर्द्वंद,
रह रहकर उठती थी टीस
छिपाती रही अपना दर्द,
भावनाओं का सैलाब समेटा
रिश्तों का रूखापन छोड़ा,
आँचल में बाँधी पुरानी यादें
ली तस्वीरें कुछ जिंदा यादों की,
एक बार फिर निकली घर से
अपनों के बीच बेगानी सी।
मुझे ब्याहकर लाने वाले
दुनिया से रुखसत हो चले थे,
खून और पानी के रिश्ते
वक़्त के दरिया में
कब का बह चुके थे।।
-----पूनम त्रिपाठी
01/03/2024
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