त्यौहारी चंदा

नवरात्रि और त्यौहार के मौसम में प्रस्तुत यह लेख किसी की भावनाओं को आहत करने के लिए नही है।अग्रिम क्षमा के साथ प्रतिक्रिया/ आलोचना का स्वागत है।🙏🙏💐🎉🎉

बचपन में स्कूली शिक्षा के दौरान हमें अनेकता में एकता का पाठ पढ़ाया गया।विभिन्न सम्प्रदायों के द्वारा उनके त्यौहार/पर्व आदि मिलजुल,सौहार्दपूर्ण वातावरण में मनाए जाते रहे है।

हमने बचपन से देखा है कि शारदीय नवरात्र आते ही रामलीला,दुर्गापूजा,देवी जागरण की धूम हुआ करती थी।
यह सभी आयोजन एक निश्चित स्थान पर परंपरागत रूप से मनाए जाते थे। हर शहर में एक रामलीला मैदान होता था,आज भी हैं। हमलोग अपने परिवारजनों तथा मुहल्ले के अन्य दोस्तों के साथ रामलीला देखने जाते थे। फिर घर आकर उसके बारे में पूरे रोमांच से पात्रों का अभिनय किया करते।आपस में टांग खिंचाई भी होती "तुम अमुक पात्र का अभिनय ठीक से नही कर रहे, हम करके दिखाते हैं।" गत्ता काटकर तलवार बनाकर भांजते,गाल फुलाकर हनुमानजी बनते,परशुराम या अंगद का पैर जमाना तथा उनके साथ संवाद बोलना,घर मे ही छोटी रामलीला होती रहती।सम्पूर्ण वातावरण उत्सवमय और हम बच्चे बहुत आनन्दित होते जिसकी याद आज भी जेहन में ताजा है।

हमारे शहर में बंगाली समाज के द्वारा बड़े बड़े पंडाल लगाकर दुर्गा पूजा का वृहद आयोजन किया जाता था। मंदिरों में पूजा अर्चना और माता के दर्शन के लिए भीड़ उमड़ पड़ती थी। 

विभिन्न संचार माध्यमों के द्वारा जन्माष्टमी,गणेशोत्सव और दुर्गापूजा,डांडिया का देश के अनेक भागों से सीधा प्रसारण किया जाने लगा जिसने लोगों को विभिन्न राज्यों के पर्वों को उत्सव रूप में अपने क्षेत्र में भी मनाने का आकर्षण बढ़ा। त्यौहार या पर्व जो अब तक राज्य विशेष में मनाए जाते थे पूरे देश में मनाया जा रहा है।लेकिन कहीं न कहीं धर्म से ज्यादा दिखावा हावी होता जा रहा है।

विगत कुछ वर्षों में देख रही हूँ कि पहले एक या दो लोग चंदा माँगने आते थे वो भी सिर्फ नवरात्रि में दुर्गापूजा और भंडारे के लिए,परंतु अब साल में जब तब आ जाते है।शुरुआत होती है बसंतपंचमी में सरस्वती पूजा से,उसके बाद होलिका,गुरुपूर्णिमा,गणेशचतुर्थी,दुर्गापूजा,वाल्मीकि जयंती आदि। चलो भाई!एक बार चंदा दे भी दिया।जैसे ही एक समूह गया दूसरा हाज़िर फिर तीसरा...।बात यहीं खत्म नही हुई,अब आगे सुनिए...अरे मैडम सामने वाले अंकल ने तो इतने दिए अब इससे कम थोड़ी न देंगी आप"...."वो उस घर के अंकल की गाड़ी तो इतनी बड़ी है लेकिन एक पैसा नही दिया बड़े कंजूस हैं"।जो भी धनराशि श्रद्धा से दी जाएगी उनको कम ही रहेगी। 

मुख्य बात यह है कि गली-गली में आयोजन की क्या आवश्यकता है? समाजिक रूप से या क्षेत्र में दबदबा बनाने के लिए छोटे-छोटे समूह में बँटते जा रहे है।पर्व सम्प्रदाय विशेष का न होकर वर्ग विशेष का होता जा रहा है।प्रायः देखा गया है कि कई बार समूहों में आपसी टकराव हो जाते है जिससे माहौल भी खराब हो जाता है।(यह लिखने से पूर्व क्षमा चाहती हूँ यदि किसी को अन्यथा लगे)सुनने में यह भी आता है कि चंदे की धनराशि पूरी खर्च नही करते उस बचे पैसों से नशाखोरी करते है। चंदा लेने के लिए बच्चे और युवा ही आते है। उस चंदे की राशि का उपयोग या दुरूपयोग भी वही करते होंगे,जो युवा पीढ़ी के लिए उचित नही है।

अनेकता में एकता का पाठ पढ़कर बड़े हुए हम जैसे लोग शायद ही इसको पसंद करते होंगे और आप में से बहुत से लोग सहमत भी होंगे।त्यौहार धीरे -धीरे इस दिखावटी चकाचौंध में अपना मूल स्वरूप और उसकी पवित्र भावना को खोते जा रहे है।
जरा सोचिए!!

~~~~Poonam Tripathi
           27/09/2022

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